<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="bn">
	<id>https://bn.banglapedia.org/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1%2C_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF</id>
	<title>হ্যালহেড, ন্যাথানিয়েল ব্র্যাসি - সংশোধনের ইতিহাস</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bn.banglapedia.org/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1%2C_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bn.banglapedia.org/index.php?title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1,_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF&amp;action=history"/>
	<updated>2026-05-02T14:55:45Z</updated>
	<subtitle>এই উইকিতে এই পাতার সংশোধনের ইতিহাস</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.40.0</generator>
	<entry>
		<id>https://bn.banglapedia.org/index.php?title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1,_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF&amp;diff=19469&amp;oldid=prev</id>
		<title>১১:৫৫, ২৪ মার্চ ২০১৫-এ Mukbil</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bn.banglapedia.org/index.php?title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1,_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF&amp;diff=19469&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2015-03-24T11:55:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;bn&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← পূর্বের সংস্করণ&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;১১:৫৫, ২৪ মার্চ ২০১৫ তারিখে সংশোধিত সংস্করণ&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l2&quot;&gt;২ নং লাইন:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;২ নং লাইন:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;হ্যালহেড, ন্যাথানিয়েল ব্র্যাসি&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  (১৭৫১-১৮৩০)  প্রাচ্যবিদ ও বৈয়াকরণিক। তিনিই প্রথম বৈয়াকরণিক যিনি বাংলা  [[ব্যাকরণ|ব্যাকরণ]] রচনায় উদাহরণ ব্যবহার করে বাংলা পাঠ ও  [[বাংলা ভাষা|বাংলা লিপি]] ব্যবহার করেন। এর আগে পর্তুগিজ ধর্মযাজকরা রোমান অক্ষরে অতি সাধারণভাবে বাংলা ব্যাকরণ ও  [[অভিধান|অভিধান]] রচনার চেষ্টা করেন। কিন্তু নিয়মতান্ত্রিক পদ্ধতিতে হ্যালহেডই প্রথম বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেন।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;হ্যালহেড, ন্যাথানিয়েল ব্র্যাসি&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  (১৭৫১-১৮৩০)  প্রাচ্যবিদ ও বৈয়াকরণিক। তিনিই প্রথম বৈয়াকরণিক যিনি বাংলা  [[ব্যাকরণ|ব্যাকরণ]] রচনায় উদাহরণ ব্যবহার করে বাংলা পাঠ ও  [[বাংলা ভাষা|বাংলা লিপি]] ব্যবহার করেন। এর আগে পর্তুগিজ ধর্মযাজকরা রোমান অক্ষরে অতি সাধারণভাবে বাংলা ব্যাকরণ ও  [[অভিধান|অভিধান]] রচনার চেষ্টা করেন। কিন্তু নিয়মতান্ত্রিক পদ্ধতিতে হ্যালহেডই প্রথম বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেন।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;১৭৫১ সালের ২৫ মে লন্ডনের এক উচ্চ মধ্যবিত্ত পরিবারে হ্যালহেডের জন্ম। তাঁর পিতা উইলিয়ম হ্যালহেড (William Halhed) ছিলেন একজন ব্যাংকার। ন্যাথানিয়েল ছিলেন পরিবারের বড় ছেলে। তিনি বিখ্যাত পাবলিক স্কুল হ্যারোতে (১৭৫৮-৬৮) পড়াশোনা করেন। সেখানে তাঁর যোগাযোগ হয় Richard Brinsley Sheridan, Samuel Parr এবং  [[জোনস, স্যার উইলিয়ম|উইলিয়ম জোনস]]&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&#039;&#039;&#039;&lt;/del&gt;-&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&#039;&#039;&#039;&lt;/del&gt;এর (১৭৪৭-১৭৯৪) সঙ্গে। হ্যারো থেকে হ্যালহেড অক্সফোর্ডে গিয়ে Christ College&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&#039;&#039;&#039;&lt;/del&gt;-&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&#039;&#039;&#039;&lt;/del&gt;এ ১৭৬৮ থেকে ১৭৭০ সাল পর্যন্ত পড়াশোনা করেন। সেখানে জোনসের সঙ্গে তাঁর পুনরায় সাক্ষাৎ ঘটে। জোনস তাঁকে আরবি শিখতে উৎসাহিত করেন। কিন্তু হ্যালহেড এ ব্যাপারে বেশিদূর অগ্রসর হতে পারেননি। এর পরিবর্তে তিনি বরং গ্রিক ও ল্যাটিন ভাষা চর্চা করেন এবং গ্রিক ভাষায় যথেষ্ট দক্ষতাও অর্জন করেন। তিনি শেরিডনের সঙ্গে যৌথ প্রচেষ্টায় The Love Epistles of Aristaenetus শীর্ষক গ্রন্থটি গ্রিক ভাষা থেকে ইংরেজিতে অনুবাদ করে বেশ খ্যাতি ও সুনাম অর্জন করেন। অনুবাদ এমনই অনবদ্য ও জনপ্রিয় ছিল যে, চার বছরে গ্রন্থটির তিনটি সংস্করণ প্রকাশিত হয়।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;[[Image:HalhedNathanielBrassey.jpg|thumb|400px|ন্যাথানিয়েল ব্র্যাসি হ্যালহেড]]&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;১৭৫১ সালের ২৫ মে লন্ডনের এক উচ্চ মধ্যবিত্ত পরিবারে হ্যালহেডের জন্ম। তাঁর পিতা উইলিয়ম হ্যালহেড (William Halhed) ছিলেন একজন ব্যাংকার। ন্যাথানিয়েল ছিলেন পরিবারের বড় ছেলে। তিনি বিখ্যাত পাবলিক স্কুল হ্যারোতে (১৭৫৮-৬৮) পড়াশোনা করেন। সেখানে তাঁর যোগাযোগ হয় Richard Brinsley Sheridan, Samuel Parr এবং  [[জোনস, স্যার উইলিয়ম|উইলিয়ম জোনস]]-এর (১৭৪৭-১৭৯৪) সঙ্গে। হ্যারো থেকে হ্যালহেড অক্সফোর্ডে গিয়ে Christ College-এ ১৭৬৮ থেকে ১৭৭০ সাল পর্যন্ত পড়াশোনা করেন। সেখানে জোনসের সঙ্গে তাঁর পুনরায় সাক্ষাৎ ঘটে। জোনস তাঁকে আরবি শিখতে উৎসাহিত করেন। কিন্তু হ্যালহেড এ ব্যাপারে বেশিদূর অগ্রসর হতে পারেননি। এর পরিবর্তে তিনি বরং গ্রিক ও ল্যাটিন ভাষা চর্চা করেন এবং গ্রিক ভাষায় যথেষ্ট দক্ষতাও অর্জন করেন। তিনি শেরিডনের সঙ্গে যৌথ প্রচেষ্টায় The Love Epistles of Aristaenetus শীর্ষক গ্রন্থটি গ্রিক ভাষা থেকে ইংরেজিতে অনুবাদ করে বেশ খ্যাতি ও সুনাম অর্জন করেন। অনুবাদ এমনই অনবদ্য ও জনপ্রিয় ছিল যে, চার বছরে গ্রন্থটির তিনটি সংস্করণ প্রকাশিত হয়।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;হ্যালহেডের মধ্যে এ সময় সাহিত্য-সম্ভাবনা প্রকাশ পায়, কিন্তু একটি অপ্রীতিকর ঘটনার শিকার হয়ে তাঁকে দেশ ত্যাগ করতে হয়। হ্যালহেড এবং শেরিডন উভয়ই একই সময়ে Miss Linley নামে এক মহিলাকে ভালোবাসতেন। শেষাবধি এতে শেরিডনের জয় হয়। এ নিয়ে পিতার সঙ্গে হ্যালহেডের মনোমালিন্য হয়। তাই সমসাময়িক অনেকের মতো তিনিও ভগ্ন হূদয়ে সাফল্য ও শান্তির সন্ধানে বিদেশে পাড়ি জমান। এভাবে তিনি ১৭৭২ সালে  [[কলকাতা|কলকাতা]]য় এসে পৌঁছান এবং ইস্ট ইন্ডিয়া কোম্পানিতে রাইটার হিসেবে প্রাথমিক পর্যায়ের চাকরি নেন। হ্যারো ও ক্রাইস্ট কলেজের ছাত্র হিসেবে এবং সাহিত্যিক গুণের অধিকারী হওয়ার কারণে হ্যালহেড অচিরেই গভর্নর Warren Hastings-এর বন্ধুতে পরিণত হন। হেস্টিংস Westminster পাবলিক স্কুলে পড়াশোনা করেছিলেন এবং প্রাচ্যবিদ্যার একজন পৃষ্ঠপোষক ছিলেন। পাবলিক স্কুলে পড়াশোনা করার সুবাদে হ্যালহেডও প্রাচ্যবিদ্যা চর্চার জীবন বেছে নেন। হেস্টিংসের অনুরোধে তিনি এক বিশাল আইনগ্রন্থ রচনা করেন: A Code of Gento Laws, or Ordinations of the Pundits। গ্রন্থটি ১৭৭৬ সালে লন্ডন থেকে প্রকাশিত হয়। এটি মূলত হিন্দু আইনশাস্ত্রের একটি সারসংকলন, যা এগারোজন ব্রাহ্মণ পন্ডিত সংস্কৃত ভাষায় সংকলন করেন। পরে একজন মুন্সি এটি প্রথমে ফারসি ভাষায় অনুবাদ করেন এবং সেখান থেকে হ্যালহেড ইংরেজিতে অনুবাদ করেন। কাজেই এটি ছিল একটি ত্রি-স্তরীয় কাজ, যদিও প্রথম দুই স্তরের পন্ডিতদের নাম গ্রন্থে উল্লিখিত হয়নি। পরবর্তী দশকে এ গ্রন্থটির কয়েকটি সংস্করণ প্রকাশিত হয়। ফরাসি ও জার্মান ভাষায়ও এর অনুবাদ হয়। এর মাধ্যমেই বয়স তিরিশে পৌঁছার আগেই হ্যালহেডের খ্যাতি ইউরোপে ছড়িয়ে পড়ে।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;হ্যালহেডের মধ্যে এ সময় সাহিত্য-সম্ভাবনা প্রকাশ পায়, কিন্তু একটি অপ্রীতিকর ঘটনার শিকার হয়ে তাঁকে দেশ ত্যাগ করতে হয়। হ্যালহেড এবং শেরিডন উভয়ই একই সময়ে Miss Linley নামে এক মহিলাকে ভালোবাসতেন। শেষাবধি এতে শেরিডনের জয় হয়। এ নিয়ে পিতার সঙ্গে হ্যালহেডের মনোমালিন্য হয়। তাই সমসাময়িক অনেকের মতো তিনিও ভগ্ন হূদয়ে সাফল্য ও শান্তির সন্ধানে বিদেশে পাড়ি জমান। এভাবে তিনি ১৭৭২ সালে  [[কলকাতা|কলকাতা]]য় এসে পৌঁছান এবং ইস্ট ইন্ডিয়া কোম্পানিতে রাইটার হিসেবে প্রাথমিক পর্যায়ের চাকরি নেন। হ্যারো ও ক্রাইস্ট কলেজের ছাত্র হিসেবে এবং সাহিত্যিক গুণের অধিকারী হওয়ার কারণে হ্যালহেড অচিরেই গভর্নর Warren Hastings-এর বন্ধুতে পরিণত হন। হেস্টিংস Westminster পাবলিক স্কুলে পড়াশোনা করেছিলেন এবং প্রাচ্যবিদ্যার একজন পৃষ্ঠপোষক ছিলেন। পাবলিক স্কুলে পড়াশোনা করার সুবাদে হ্যালহেডও প্রাচ্যবিদ্যা চর্চার জীবন বেছে নেন। হেস্টিংসের অনুরোধে তিনি এক বিশাল আইনগ্রন্থ রচনা করেন: A Code of Gento Laws, or Ordinations of the Pundits। গ্রন্থটি ১৭৭৬ সালে লন্ডন থেকে প্রকাশিত হয়। এটি মূলত হিন্দু আইনশাস্ত্রের একটি সারসংকলন, যা এগারোজন ব্রাহ্মণ পন্ডিত সংস্কৃত ভাষায় সংকলন করেন। পরে একজন মুন্সি এটি প্রথমে ফারসি ভাষায় অনুবাদ করেন এবং সেখান থেকে হ্যালহেড ইংরেজিতে অনুবাদ করেন। কাজেই এটি ছিল একটি ত্রি-স্তরীয় কাজ, যদিও প্রথম দুই স্তরের পন্ডিতদের নাম গ্রন্থে উল্লিখিত হয়নি। পরবর্তী দশকে এ গ্রন্থটির কয়েকটি সংস্করণ প্রকাশিত হয়। ফরাসি ও জার্মান ভাষায়ও এর অনুবাদ হয়। এর মাধ্যমেই বয়স তিরিশে পৌঁছার আগেই হ্যালহেডের খ্যাতি ইউরোপে ছড়িয়ে পড়ে।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l8&quot;&gt;৮ নং লাইন:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;৯ নং লাইন:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;ওয়ারেন হেস্টিংসের অনুরোধে হ্যালহেড তাঁর দ্বিতীয় প্রকল্প বাংলা ভাষার ব্যাকরণ রচনায় ব্যাপৃত হন। তাঁর A Grammar of the Bengal Language গ্রন্থটি ১৭৭৮ সালে প্রকাশিত হয়। এ গ্রন্থ প্রকাশের পর হ্যালহেড লন্ডনে ফিরে যান এবং ১৭৮৪ সালে আবার কলকাতায় ফিরে আসেন। ততদিনে কলকাতার সামাজিক দৃশ্যপট অনেকটাই পাল্টে যায় এবং হেস্টিংস কোম্পানির কোর্ট অব ডিরেক্টরদের রোষাণলে পড়েন। হেস্টিংসকে এক সময় পদত্যাগ করতে বলা হয় এবং তিনি পদত্যাগও করেন। এ ঘটনায় হ্যালহেডও চাকরিতে ইস্তফা দিয়ে ওই বছরই লন্ডন ফিরে যান।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;ওয়ারেন হেস্টিংসের অনুরোধে হ্যালহেড তাঁর দ্বিতীয় প্রকল্প বাংলা ভাষার ব্যাকরণ রচনায় ব্যাপৃত হন। তাঁর A Grammar of the Bengal Language গ্রন্থটি ১৭৭৮ সালে প্রকাশিত হয়। এ গ্রন্থ প্রকাশের পর হ্যালহেড লন্ডনে ফিরে যান এবং ১৭৮৪ সালে আবার কলকাতায় ফিরে আসেন। ততদিনে কলকাতার সামাজিক দৃশ্যপট অনেকটাই পাল্টে যায় এবং হেস্টিংস কোম্পানির কোর্ট অব ডিরেক্টরদের রোষাণলে পড়েন। হেস্টিংসকে এক সময় পদত্যাগ করতে বলা হয় এবং তিনি পদত্যাগও করেন। এ ঘটনায় হ্যালহেডও চাকরিতে ইস্তফা দিয়ে ওই বছরই লন্ডন ফিরে যান।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;দেশে ফিরে হ্যালহেড বেশ কিছু অনুবাদের কাজ সম্পাদন করেন। ১৭৮৭ সালে তিনি দারাশিকোর ফারসি অনুবাদ অবলম্বনে ইংরেজিতে  [[উপনিষদ|উপনিষদ]] অনুবাদ করেন। তিনি ১৭৯১ সালে পার্লামেন্টের সদস্য নির্বাচিত হন। তাঁর উদ্দেশ্য ছিল বিচারে হেস্টিংসকে সহায়তা করা এবং এ কাজটি তিনি অত্যন্ত দক্ষতার সঙ্গেই করেছিলেন। কিন্তু অচিরেই ব্রিটিশ চিন্তাবিদরা হ্যালহেডের মতামতের নিরপেক্ষতায় সন্দেহ প্রকাশ করতে শুরু করেন, কারণ তিনি যোগ ও সুফি মতবাদে বিশ্বাস করতেন। বস্ত্ততপক্ষে হ্যালহেড তখন চিন্তাভাবনা করছিলেন কীভাবে প্রাচ্য ও প্রতীচ্যের ভাবনার মধ্যে সমন্বয় সাধন করা যায়। তিনি নিজেকে ঈশ্বরের দূত হিসেবে ঘোষণাকারী জনৈক Richard Brothers&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&#039;&#039;&#039;&lt;/del&gt;-&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&#039;&#039;&#039;&lt;/del&gt;কে সমর্থন করেন। এর ফলে প্রাচ্যবিদ হিসেবে তাঁর সামাজিক মর্যাদা অনেকাংশে ক্ষুণ্ণ হয়। ফরাসি বিপ্লবের প্রতি সমবেদনা প্রকাশ করার কারণে লন্ডনবাসীরা তাঁকে ঘৃণার চোখে দেখত। ফরাসি বিপ্লবের নীতির প্রতি তাঁর বিশ্বাস এতই গভীর ছিল যে, তিনি তাঁর সারা জীবনের সঞ্চিত অর্থ নিরাপত্তা ও অধিক লাভের আশায় ফ্রান্সে স্থানান্তরিত করেন। এটা তাঁর একটা নির্বুদ্ধিতার কাজ হয়েছিল, কারণ পরে তিনি তাঁর সব অর্থ হারান। বন্ধুবিবর্জিত ও অর্থশূন্য অবস্থায় হ্যালহেড ১৮৩০ সালের ১৮ ফেব্রুয়ারি মারা যান।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;দেশে ফিরে হ্যালহেড বেশ কিছু অনুবাদের কাজ সম্পাদন করেন। ১৭৮৭ সালে তিনি দারাশিকোর ফারসি অনুবাদ অবলম্বনে ইংরেজিতে  [[উপনিষদ|উপনিষদ]] অনুবাদ করেন। তিনি ১৭৯১ সালে পার্লামেন্টের সদস্য নির্বাচিত হন। তাঁর উদ্দেশ্য ছিল বিচারে হেস্টিংসকে সহায়তা করা এবং এ কাজটি তিনি অত্যন্ত দক্ষতার সঙ্গেই করেছিলেন। কিন্তু অচিরেই ব্রিটিশ চিন্তাবিদরা হ্যালহেডের মতামতের নিরপেক্ষতায় সন্দেহ প্রকাশ করতে শুরু করেন, কারণ তিনি যোগ ও সুফি মতবাদে বিশ্বাস করতেন। বস্ত্ততপক্ষে হ্যালহেড তখন চিন্তাভাবনা করছিলেন কীভাবে প্রাচ্য ও প্রতীচ্যের ভাবনার মধ্যে সমন্বয় সাধন করা যায়। তিনি নিজেকে ঈশ্বরের দূত হিসেবে ঘোষণাকারী জনৈক Richard Brothers-কে সমর্থন করেন। এর ফলে প্রাচ্যবিদ হিসেবে তাঁর সামাজিক মর্যাদা অনেকাংশে ক্ষুণ্ণ হয়। ফরাসি বিপ্লবের প্রতি সমবেদনা প্রকাশ করার কারণে লন্ডনবাসীরা তাঁকে ঘৃণার চোখে দেখত। ফরাসি বিপ্লবের নীতির প্রতি তাঁর বিশ্বাস এতই গভীর ছিল যে, তিনি তাঁর সারা জীবনের সঞ্চিত অর্থ নিরাপত্তা ও অধিক লাভের আশায় ফ্রান্সে স্থানান্তরিত করেন। এটা তাঁর একটা নির্বুদ্ধিতার কাজ হয়েছিল, কারণ পরে তিনি তাঁর সব অর্থ হারান। বন্ধুবিবর্জিত ও অর্থশূন্য অবস্থায় হ্যালহেড ১৮৩০ সালের ১৮ ফেব্রুয়ারি মারা যান।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;বাঙালি সংস্কৃতির ইতিহাসে হ্যালহেডের সবচেয়ে উল্লেখযোগ্য অবদান তাঁর বাংলা ভাষার ব্যাকরণ। এর আগে পর্তু©র্গজ ধর্মযাজকরা তাঁদের নিজস্ব ভাষায় কিছু বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেছিলেন বটে, কিন্তু সেগুলি ছিল সংক্ষিপ্ত ও বিক্ষিপ্ত এবং সেগুলি রচিত হয়েছিল তাঁদের ধর্মপ্রচারের কাজে ব্যবহারের জন্য। হ্যালহেডের কাজটি প্রকৃতপক্ষেই ছিল একজন নিঃস্বার্থ বুদ্ধিজীবীর কাজ। তিনি ইউরোপীয় যুক্তি ও বিজ্ঞান-মনস্কতার প্রভাবে বিশ্বাস করতেন যে, জ্ঞানের চর্চা কেবল জ্ঞানের প্রয়োজনেই করা উচিত। তাঁর ব্যাকরণেই সর্বপ্রথম বাংলা অক্ষরের প্রকাশ ঘটে। বাংলা ভাষার প্রথম মুদ্রিত ব্যাকরণ  [[ভোকাবুলারিও|ভোকাবুলারিও]] &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;পর্তু©র্গজ &lt;/del&gt;ভাষায় রচিত (লিসবন, ১৭৪৩), কিন্তু হ্যালহেডের ব্যাকরণ ইংরেজিতে রচিত এবং এতে বাংলায় প্রচুর উদাহরণ, উদ্ধৃতি ইত্যাদি দেওয়া হয়েছে। তবে হ্যালহেডের একটা দুর্বলতা ছিল এই যে, তিনি  [[বাংলা ভাষা|বাংলা ভাষা]] ভাল করে না জেনেই বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেছিলেন। তাই তাঁর প্রচেষ্টার সুদূরপ্রসারী কোনো ফল দেখা যায়নি, যদিও তাঁর মাধ্যমেই বাংলা ব্যাকরণ আধুনিকতার দিকে এগুতে থাকে।  [সিরাজুল ইসলাম]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;বাঙালি সংস্কৃতির ইতিহাসে হ্যালহেডের সবচেয়ে উল্লেখযোগ্য অবদান তাঁর বাংলা ভাষার ব্যাকরণ। এর আগে পর্তু©র্গজ ধর্মযাজকরা তাঁদের নিজস্ব ভাষায় কিছু বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেছিলেন বটে, কিন্তু সেগুলি ছিল সংক্ষিপ্ত ও বিক্ষিপ্ত এবং সেগুলি রচিত হয়েছিল তাঁদের ধর্মপ্রচারের কাজে ব্যবহারের জন্য। হ্যালহেডের কাজটি প্রকৃতপক্ষেই ছিল একজন নিঃস্বার্থ বুদ্ধিজীবীর কাজ। তিনি ইউরোপীয় যুক্তি ও বিজ্ঞান-মনস্কতার প্রভাবে বিশ্বাস করতেন যে, জ্ঞানের চর্চা কেবল জ্ঞানের প্রয়োজনেই করা উচিত। তাঁর ব্যাকরণেই সর্বপ্রথম বাংলা অক্ষরের প্রকাশ ঘটে। বাংলা ভাষার প্রথম মুদ্রিত ব্যাকরণ  [[ভোকাবুলারিও|ভোকাবুলারিও]] &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;পর্তুগিজ &lt;/ins&gt;ভাষায় রচিত (লিসবন, ১৭৪৩), কিন্তু হ্যালহেডের ব্যাকরণ ইংরেজিতে রচিত এবং এতে বাংলায় প্রচুর উদাহরণ, উদ্ধৃতি ইত্যাদি দেওয়া হয়েছে। তবে হ্যালহেডের একটা দুর্বলতা ছিল এই যে, তিনি  [[বাংলা ভাষা|বাংলা ভাষা]] ভাল করে না জেনেই বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেছিলেন। তাই তাঁর প্রচেষ্টার সুদূরপ্রসারী কোনো ফল দেখা যায়নি, যদিও তাঁর মাধ্যমেই বাংলা ব্যাকরণ আধুনিকতার দিকে এগুতে থাকে।  [সিরাজুল ইসলাম]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br/&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[en:Halhed, Nathaniel Brassey]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[en:Halhed, Nathaniel Brassey]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>Mukbil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bn.banglapedia.org/index.php?title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1,_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF&amp;diff=8122&amp;oldid=prev</id>
		<title>NasirkhanBot: Added Ennglish article link</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bn.banglapedia.org/index.php?title=%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B2%E0%A6%B9%E0%A7%87%E0%A6%A1,_%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%A5%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BF%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A7%87%E0%A6%B2_%E0%A6%AC%E0%A7%8D%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A6%BF&amp;diff=8122&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2014-05-04T23:19:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Added Ennglish article link&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;নতুন পাতা&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[Category:বাংলাপিডিয়া]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;হ্যালহেড, ন্যাথানিয়েল ব্র্যাসি&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  (১৭৫১-১৮৩০)  প্রাচ্যবিদ ও বৈয়াকরণিক। তিনিই প্রথম বৈয়াকরণিক যিনি বাংলা  [[ব্যাকরণ|ব্যাকরণ]] রচনায় উদাহরণ ব্যবহার করে বাংলা পাঠ ও  [[বাংলা ভাষা|বাংলা লিপি]] ব্যবহার করেন। এর আগে পর্তুগিজ ধর্মযাজকরা রোমান অক্ষরে অতি সাধারণভাবে বাংলা ব্যাকরণ ও  [[অভিধান|অভিধান]] রচনার চেষ্টা করেন। কিন্তু নিয়মতান্ত্রিক পদ্ধতিতে হ্যালহেডই প্রথম বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেন।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
১৭৫১ সালের ২৫ মে লন্ডনের এক উচ্চ মধ্যবিত্ত পরিবারে হ্যালহেডের জন্ম। তাঁর পিতা উইলিয়ম হ্যালহেড (William Halhed) ছিলেন একজন ব্যাংকার। ন্যাথানিয়েল ছিলেন পরিবারের বড় ছেলে। তিনি বিখ্যাত পাবলিক স্কুল হ্যারোতে (১৭৫৮-৬৮) পড়াশোনা করেন। সেখানে তাঁর যোগাযোগ হয় Richard Brinsley Sheridan, Samuel Parr এবং  [[জোনস, স্যার উইলিয়ম|উইলিয়ম জোনস]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;এর (১৭৪৭-১৭৯৪) সঙ্গে। হ্যারো থেকে হ্যালহেড অক্সফোর্ডে গিয়ে Christ College&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;এ ১৭৬৮ থেকে ১৭৭০ সাল পর্যন্ত পড়াশোনা করেন। সেখানে জোনসের সঙ্গে তাঁর পুনরায় সাক্ষাৎ ঘটে। জোনস তাঁকে আরবি শিখতে উৎসাহিত করেন। কিন্তু হ্যালহেড এ ব্যাপারে বেশিদূর অগ্রসর হতে পারেননি। এর পরিবর্তে তিনি বরং গ্রিক ও ল্যাটিন ভাষা চর্চা করেন এবং গ্রিক ভাষায় যথেষ্ট দক্ষতাও অর্জন করেন। তিনি শেরিডনের সঙ্গে যৌথ প্রচেষ্টায় The Love Epistles of Aristaenetus শীর্ষক গ্রন্থটি গ্রিক ভাষা থেকে ইংরেজিতে অনুবাদ করে বেশ খ্যাতি ও সুনাম অর্জন করেন। অনুবাদ এমনই অনবদ্য ও জনপ্রিয় ছিল যে, চার বছরে গ্রন্থটির তিনটি সংস্করণ প্রকাশিত হয়।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
হ্যালহেডের মধ্যে এ সময় সাহিত্য-সম্ভাবনা প্রকাশ পায়, কিন্তু একটি অপ্রীতিকর ঘটনার শিকার হয়ে তাঁকে দেশ ত্যাগ করতে হয়। হ্যালহেড এবং শেরিডন উভয়ই একই সময়ে Miss Linley নামে এক মহিলাকে ভালোবাসতেন। শেষাবধি এতে শেরিডনের জয় হয়। এ নিয়ে পিতার সঙ্গে হ্যালহেডের মনোমালিন্য হয়। তাই সমসাময়িক অনেকের মতো তিনিও ভগ্ন হূদয়ে সাফল্য ও শান্তির সন্ধানে বিদেশে পাড়ি জমান। এভাবে তিনি ১৭৭২ সালে  [[কলকাতা|কলকাতা]]য় এসে পৌঁছান এবং ইস্ট ইন্ডিয়া কোম্পানিতে রাইটার হিসেবে প্রাথমিক পর্যায়ের চাকরি নেন। হ্যারো ও ক্রাইস্ট কলেজের ছাত্র হিসেবে এবং সাহিত্যিক গুণের অধিকারী হওয়ার কারণে হ্যালহেড অচিরেই গভর্নর Warren Hastings-এর বন্ধুতে পরিণত হন। হেস্টিংস Westminster পাবলিক স্কুলে পড়াশোনা করেছিলেন এবং প্রাচ্যবিদ্যার একজন পৃষ্ঠপোষক ছিলেন। পাবলিক স্কুলে পড়াশোনা করার সুবাদে হ্যালহেডও প্রাচ্যবিদ্যা চর্চার জীবন বেছে নেন। হেস্টিংসের অনুরোধে তিনি এক বিশাল আইনগ্রন্থ রচনা করেন: A Code of Gento Laws, or Ordinations of the Pundits। গ্রন্থটি ১৭৭৬ সালে লন্ডন থেকে প্রকাশিত হয়। এটি মূলত হিন্দু আইনশাস্ত্রের একটি সারসংকলন, যা এগারোজন ব্রাহ্মণ পন্ডিত সংস্কৃত ভাষায় সংকলন করেন। পরে একজন মুন্সি এটি প্রথমে ফারসি ভাষায় অনুবাদ করেন এবং সেখান থেকে হ্যালহেড ইংরেজিতে অনুবাদ করেন। কাজেই এটি ছিল একটি ত্রি-স্তরীয় কাজ, যদিও প্রথম দুই স্তরের পন্ডিতদের নাম গ্রন্থে উল্লিখিত হয়নি। পরবর্তী দশকে এ গ্রন্থটির কয়েকটি সংস্করণ প্রকাশিত হয়। ফরাসি ও জার্মান ভাষায়ও এর অনুবাদ হয়। এর মাধ্যমেই বয়স তিরিশে পৌঁছার আগেই হ্যালহেডের খ্যাতি ইউরোপে ছড়িয়ে পড়ে।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ওয়ারেন হেস্টিংসের অনুরোধে হ্যালহেড তাঁর দ্বিতীয় প্রকল্প বাংলা ভাষার ব্যাকরণ রচনায় ব্যাপৃত হন। তাঁর A Grammar of the Bengal Language গ্রন্থটি ১৭৭৮ সালে প্রকাশিত হয়। এ গ্রন্থ প্রকাশের পর হ্যালহেড লন্ডনে ফিরে যান এবং ১৭৮৪ সালে আবার কলকাতায় ফিরে আসেন। ততদিনে কলকাতার সামাজিক দৃশ্যপট অনেকটাই পাল্টে যায় এবং হেস্টিংস কোম্পানির কোর্ট অব ডিরেক্টরদের রোষাণলে পড়েন। হেস্টিংসকে এক সময় পদত্যাগ করতে বলা হয় এবং তিনি পদত্যাগও করেন। এ ঘটনায় হ্যালহেডও চাকরিতে ইস্তফা দিয়ে ওই বছরই লন্ডন ফিরে যান।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
দেশে ফিরে হ্যালহেড বেশ কিছু অনুবাদের কাজ সম্পাদন করেন। ১৭৮৭ সালে তিনি দারাশিকোর ফারসি অনুবাদ অবলম্বনে ইংরেজিতে  [[উপনিষদ|উপনিষদ]] অনুবাদ করেন। তিনি ১৭৯১ সালে পার্লামেন্টের সদস্য নির্বাচিত হন। তাঁর উদ্দেশ্য ছিল বিচারে হেস্টিংসকে সহায়তা করা এবং এ কাজটি তিনি অত্যন্ত দক্ষতার সঙ্গেই করেছিলেন। কিন্তু অচিরেই ব্রিটিশ চিন্তাবিদরা হ্যালহেডের মতামতের নিরপেক্ষতায় সন্দেহ প্রকাশ করতে শুরু করেন, কারণ তিনি যোগ ও সুফি মতবাদে বিশ্বাস করতেন। বস্ত্ততপক্ষে হ্যালহেড তখন চিন্তাভাবনা করছিলেন কীভাবে প্রাচ্য ও প্রতীচ্যের ভাবনার মধ্যে সমন্বয় সাধন করা যায়। তিনি নিজেকে ঈশ্বরের দূত হিসেবে ঘোষণাকারী জনৈক Richard Brothers&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;-&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;কে সমর্থন করেন। এর ফলে প্রাচ্যবিদ হিসেবে তাঁর সামাজিক মর্যাদা অনেকাংশে ক্ষুণ্ণ হয়। ফরাসি বিপ্লবের প্রতি সমবেদনা প্রকাশ করার কারণে লন্ডনবাসীরা তাঁকে ঘৃণার চোখে দেখত। ফরাসি বিপ্লবের নীতির প্রতি তাঁর বিশ্বাস এতই গভীর ছিল যে, তিনি তাঁর সারা জীবনের সঞ্চিত অর্থ নিরাপত্তা ও অধিক লাভের আশায় ফ্রান্সে স্থানান্তরিত করেন। এটা তাঁর একটা নির্বুদ্ধিতার কাজ হয়েছিল, কারণ পরে তিনি তাঁর সব অর্থ হারান। বন্ধুবিবর্জিত ও অর্থশূন্য অবস্থায় হ্যালহেড ১৮৩০ সালের ১৮ ফেব্রুয়ারি মারা যান।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
বাঙালি সংস্কৃতির ইতিহাসে হ্যালহেডের সবচেয়ে উল্লেখযোগ্য অবদান তাঁর বাংলা ভাষার ব্যাকরণ। এর আগে পর্তু©র্গজ ধর্মযাজকরা তাঁদের নিজস্ব ভাষায় কিছু বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেছিলেন বটে, কিন্তু সেগুলি ছিল সংক্ষিপ্ত ও বিক্ষিপ্ত এবং সেগুলি রচিত হয়েছিল তাঁদের ধর্মপ্রচারের কাজে ব্যবহারের জন্য। হ্যালহেডের কাজটি প্রকৃতপক্ষেই ছিল একজন নিঃস্বার্থ বুদ্ধিজীবীর কাজ। তিনি ইউরোপীয় যুক্তি ও বিজ্ঞান-মনস্কতার প্রভাবে বিশ্বাস করতেন যে, জ্ঞানের চর্চা কেবল জ্ঞানের প্রয়োজনেই করা উচিত। তাঁর ব্যাকরণেই সর্বপ্রথম বাংলা অক্ষরের প্রকাশ ঘটে। বাংলা ভাষার প্রথম মুদ্রিত ব্যাকরণ  [[ভোকাবুলারিও|ভোকাবুলারিও]] পর্তু©র্গজ ভাষায় রচিত (লিসবন, ১৭৪৩), কিন্তু হ্যালহেডের ব্যাকরণ ইংরেজিতে রচিত এবং এতে বাংলায় প্রচুর উদাহরণ, উদ্ধৃতি ইত্যাদি দেওয়া হয়েছে। তবে হ্যালহেডের একটা দুর্বলতা ছিল এই যে, তিনি  [[বাংলা ভাষা|বাংলা ভাষা]] ভাল করে না জেনেই বাংলা ব্যাকরণ রচনা করেছিলেন। তাই তাঁর প্রচেষ্টার সুদূরপ্রসারী কোনো ফল দেখা যায়নি, যদিও তাঁর মাধ্যমেই বাংলা ব্যাকরণ আধুনিকতার দিকে এগুতে থাকে।  [সিরাজুল ইসলাম]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[en:Halhed, Nathaniel Brassey]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>NasirkhanBot</name></author>
	</entry>
</feed>